Kavisaab

Seene Pe Shayari

बिखरे पत्तों सा मुकद्दर है अपना,
कोई चुनेगा भी तो जलाने के लिए..

The Shayari

वक़्त वो रखैल है जिस पर अगर तुम
सब्र की दौलत लुटाते रहे,
तो एक अज़ीज़ लम्हे में
तुम्हें नज़र उठाकर ज़रूर देखती है..
बिखरे पत्तों सा मुकद्दर है अपना,
कोई चुनेगा भी तो जलाने के लिए..
नाराज़गी औरतों के चेहरे पे सजती है,
मर्द मुस्कुरा के महफ़िलें छोड़ दिया करते हैं।
मायूसी के जज़्बातों को ये ख़ामोशी में बुनते हैं
एक उम्र के मर्द अक्सर ग़ज़लें पुरानी सुनते हैं
या तो वो मुझे सारे जवाब दे,
या मेरे पहले सवाल पर छोड़ दे..
या तो मेरी शायरी को समझे वो,
या मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे..
दिन तेरी आरज़ू में कटता है,
पल भर में शाम होती है...
पहले दूसरे पर झूम लेता हूं,
तीसरे के बाद तेरी ही बात होती है...
एक आस का कर्ज़ हर साँस से अदा करना है,
तुझसे एक साँस पहले ख़ुद को विदा करना है..
दवा से, दुआ से, टूटा जिस्म संवर जाता है..
उस्ताद साब की एक नज़्म से..
बिखरी रूह निखर आती है..
"

Poetry is not something I write. It is something that happens to me — at 3am, in traffic, in silence, in betrayal.

— Kavisaab

The Lineage

बज़्म-ए-सुख़न में मौजूद थे
ग़ालिब, मीर, ज़ौक़..
और न जाने कौन थे....

बरसों बाद जो याद रहे,
महसूस हुए..
वो जौंन थे, जौंन थे..जौंन थे.....

Jaun Elia

Faiz Ahmed Faiz

Allama Iqbal

Mirza Ghalib

Mir Taqi Mir

"The universe Kavisaab inherits —
and makes entirely his own."

"

Poetry was never meant to stay in books. It was meant to be carried — on the chest, in the street, at 2am.

— Seene Pe Shayari

सीने पे शायरी

Poetry is not decoration.
It is diagnosis.
Wear what you feel —
unapologetically.

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